You are here
Home > बोलता बचपन > कहानी: दो रुपए की बेटी

कहानी: दो रुपए की बेटी

Story image

पापा सिरदर्द से कराह रहे थे इसलिए मैं उनकी दूसरी बेटी से लड़ने पहुँच गयी. उसे पापा दो रुपए में लेकर आये थे, इसलिए ख़्याल नही रखती होगी, मेरा मानना था…

बात तब की है जब मैं दस साल की थी. मैं इकलौती बहन थी. पापा मुझसे बहुत प्यार करते थे, पर चिढ़ाते भी बहुत थे।

जब मैं उनसे रूठती तो कहते, ” मैं जा रहा हूँ दो रुपए की नयी बेटी ख़रीदकर लाने। उसको खिलौने दूँगा, चॉकलेट दूँगा, बहुत प्यार करूँगा। तुम रूठी रहो!

मैं तुरंत पापा से बात करने लगती थी. पर मेरे दिमाग़ में यह बात बैठ गयी थी कि पापा दो रुपए से नयी बेटी ख़रीदकर ले आएंगे।

एक दिन घर पर पड़ोस में रहने वाली ऑन्टी की बेटी आयी. अरे बिटिया, आओ बैठो, ये लो चॉकलेट खाओ ‘ पापा ने कहा.

‘अंकल आप ये ड्रेस किसके लिए लाए हैं? बहुत सुंदर है’ उसने  पूछा।

‘तुम्हें पसंद है तो ले जाओ’ कहकर पिताजी ने मेरी नई ड्रेस उसे दे दी। उस दिन से वो लड़की रोज़ घर आती और कुछ ना कुछ लेकर ही जाती।

‘अरे ! श्रेया प्यास लगी है,ज़रा पानी देना’ एक दिन पिताजी ने मुझसे कहा।

‘नहीं देती पानी, जाओ अपनी बेटी से मांगो। ‘मैं कहते हुए कमरे में चली गई। ‘अरे, श्रेया सिर में दर्द हो रहा है। ज़रा दवा ला देना’ पिताजी ने फिर कहा।

‘ अपनी बेटी से माँग लो! ‘मैं ग़ुस्से में कहती हुई स्कूल चली गई। शाम को आई तो पिताजी सिरदर्द से कराह रहे थे।

‘मैं उनके पास बैठकर रोने लगी।’ कहाँ है आपकी बेटी उसने दवा क्यों नहीं दी? सिर्फ वो चॉकलेट, खिलौने और कपड़े लेगी।’ कहती हुई मैं पड़ोस की आंटी की बेटी के पास गयी और ख़ूब भला-बुरा कहा।

‘समझती क्या हो तुम, पापा ने तुम्हे इतना प्यार दिया और तुम… अच्छा इसमें गलती तुम्हारी तो है ही नहीं, तुम तो दो रुपए में ख़रीदी गयी हो, तुम्हे क्या मतलब पापा से’ मैं कहती ही जा रही थी कि पीछे से हंसी सुनाई पड़ी।

मैंने पलटकर देखा तो पापा हंस रहे थे. उन्होंने हँसते हुए कहा, ‘बेटी दो रुपए में तो आजकल चॉकलेट भी नहीं मिलती, बेटी कहाँ से खरीदूंगा और बेटी दो रुपए में ख़रीदने की वस्तु नही, वो तो प्यार और सम्मान देने की चीज़ है।

मुझे कुछ समझ नही आया तब उन्होंने कहा, ” मैं तो दो रुपए में बेटी ख़रीदने की बात इसलिए कहता था, क्यूंकि तुम्हे मनाने का यही तरीक़ा मेरे पास था। पता है, ये जिसे तुम मेरी बेटी मानती हो इसके पापा बाहर काम करते हैं और मम्मी इसी शहर में काम करती हैं। यह स्कूल से आने के बाद अकेली रहती है , इसलिए मैं इसके साथ खेलता और बातें करता हूँ ,ताकि इसे अच्छा लगे।’

पापा कहते-कहते, ‘आह ! कह कर कराह उठे।’ अरे, पापा आपको क्या हुआ?’ मैंने पूछा। मेरा सिर दर्द कर रहा है। क्या मेरी बेटी मुझे दवा देगी?’ पापा ने कहा। और मैं पापा के गले लगकर रोने लगी।

 

दो टूक: प्यारे पाठकगण, बच्चों और उनसे जुड़ी गतिविधियों को मंच प्रदान करने के लिए द हिन्द परिधान ने ‘बोलता बचपन’ नामक एक रचना पद्धति अख्तियार किया है। जिसमे श्रेया जैसे अनेक बाल रचनाकार अपनी रचनाओं को दुनिया के सम्मुख प्रस्तुत करेंगे। यह ऑनलाइन मीडिया की दुनिया में हमारा पहला प्रयास है। जाहिरतौर से प्रोत्साहन एवं समर्थन अभिलाषित है। – संपादक, द हिन्द परिधान

श्रेया कुमारी
श्रेया कुमारी
श्रेया कुमारी बाल कहानीकार है। यह माध्यमिक विद्यालय, पटना कि दसवीं की छात्रा है। बिहार बाल भवन 'किलकारी' में सृजनात्मक लेखन सीखती हैं। और इनका सपना फिल्मों के लिए कहानी लिखना है।
Top