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कहानी: एक मासूम परी

Child Abuse

हर कहानी के दो पहलू होते हैं, एक वह जो हमें दिखाया जाता है और दूसरा वह जिसे लोग कहीं दफ़ना देना चाहते हैं। कुछ ऐसी ही कहानी थी परी की। 132 करोड़ की आबादी वाले इस देश में न जाने कितनी परियां हैं और कितने राक्षस, इस कहानी के अंत तक आप सबसे वाक़िफ़ हो जाएंगे। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते थे, पारी के माँ-बाप ने उसे एक छल्ला पकड़ा दिया था।

आगरा रेलवे स्टेशन से लेकर दिल्ली तक, परी उस छल्ले में से कभी अपना सिर निकालती तो कभी अपने हाथ-पाँव। आम भाषा में कहा जाए तो वह अपने परिवार के लिए एक सहारा बन गयी थी। अपने लचीलेपन का लाभ उठाते, परी इतनी पैसे कमा ही लेती थी कि अपने परिवार को दो वक़्त की रोटी खिला सके। आठ साल की परी के पिता शम्भुनाथ एक अपाहिज भिखारी थे, माँ रेलगाड़ियों में ढोल बजाकर पैसे कमाती थी और छोटे भाई की आयु कुछ महीनों की थी। अनेक बार लोगों पढ़ाई-लिखाई के बारे में परी से पूछा तो वो शर्मिंदा हो गयी। बाप से पढ़ने की इजाज़त मांगी तो केवल गालियाँ सुनने को मिली।

किताबों का शौक़ रखने वाली परी को एक किताब भी नही मिल सकी, मिली तो केवल मुसीबतें और दुःख। जब कोई व्यक्ति उसे मुफ़्त की किताबें दे देता तो  शम्भुनाथ उन्हें फाड़कर फ़ेंक देता था। इसी कारण घर से नाराज़ होकर, परी एक सड़क पर अपने छल्ले के साथ नृत्य करती हुई जा रही थी , कि कुछ मनचले उसका पीछा करने लगे। परी घबरा गयी थी और उसकी रफ़्तार में एक तेज़ी आ गयी थी। कुछ देर बाद उन गुंडों ने उसका रास्ता रोक लिया और उसे परेशान करने लगे।

गुंडों ने परी का अपहरण कर, उसकी हत्या कर दी और एक नदी में बहा दिया। जब पुलिस और मीडिया को यह पता चला तो पूरे देश में एक कोहराम मच गया। हर कोने से इंसाफ़ की आवाज़ें बुलंद होने लगी। आज वो लोग भी परी का साथ देने को खड़े हुए थे, जो उसके क़त्ल के ज़िम्मेदार थे। यह वही लोग थे जिन्होंने उसकी चीख़ों को नज़रअंदाज़ किया था। इस परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए यही कहा जा सकता है कि

आलम-ए-पाखंड की शायद यही है इन्तेहा ,
हम तमाशाई थे, जब ख़ूँ कहीं बहता रहा।

कभी वक़्त निकालकर देखिएगा, कहीं आप भी इस भीड़ का हिस्सा तो नहीं!

Syed Zuhair Ali
Syed Zuhair Ali
A student of Journalism and Mass Communication who loves to write about social issues through his poetries.
http://thehindparidhan.com

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