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क्या समाज में बदलाव लाना एक पाप है ?

 

                  सौजन्य: www.tribune.com.pk

दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के तैमूर नगर इलाक़े में ,दो अज्ञात लोगों ने 34-वर्षीय रुपेश नामक एक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी। स्थानीय लोगों का मानना है कि दोनों अज्ञात व्यक्ति ड्रग विक्रेताओं से संबंधित थे। वहीं रुपेश ड्रग की बिक्री के विरुद्ध लगातार आवाज़ उठा रहा था। यह हादसा दर्शाता है कि आज के समाज में अलग सोच रखना किसी भी ख़तरे से कम नही है।

हमारे समाज में विभिन्न प्रकार के लोग एक साथ रहते हैं, यहीं कारण है कि ” विविधता में एकता ” भारत की पहचान है। जब अलग धर्म और जाति के लोग एक साथ रहेंगे तो स्पष्ट है कि सबकी सोच में थोड़ा बहुत अंतर तो रहेगा ही , मगर यह बात हमारे समाज के एक वर्ग को समझ नहीं आती। उनके लिए मनुष्य के जीवन से अधिक उसकी सोच मायने रखती है।

1992 से लेकर 2018 तक, तकरीबन 25 पत्रकार इस ही सोच के शिकार बने हैं, चाहे वह 2002 में राम चंद्र छत्रपति हों या 2018 में शुजात बुख़ारी। इन सभी घटनाओं में एक चीज़ सामान्य है कि हर बार कुछ लोगों का समूह आता है और हत्या को अंजाम देकर फ़रार हो जाता है। बाद में, भले ही पुलिस अपराधियों का पता भी लगा ले, मगर क्या फ़र्क़ पड़ता है ? ऐसी कार्यवाही से न तो किसी को न्याय मिलता है न मृतक जीवित हो सकता है।

आखिर कब तक हमेशा क्रन्तिकारी, पत्रकार और समाज को बदलने वाले लोग ही इन हादसों के शिकार बनते रहेंगे। पूरी जानकारी होने के बावजूद भी पुलिस और प्रशासन कुछ भी नही कर पाते तो क्या समाज में बदलाव लाना या समाज को आईना दिखाना क्या इतना बड़ा पाप है ? अगर मनुष्य ही बदलाव से कतराएगा तो विकास कहाँ से आएगा। जिस दिन यह बात समाज को समझ आ गयी, हम भी विकसित हो जाएंगे।

Syed Zuhair Ali
Syed Zuhair Ali
A student of Journalism and Mass Communication who loves to write about social issues through his poetries.
http://thehindparidhan.com
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