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एक शाम रेख़्ता के साथ

Jashn-e-Rekhta Urdu at National Stadium, Delhi

भाषा और बोली एक ऐसा माध्यम है जो न ही केवल एक देश को जोड़ता है बल्कि समाज के हर उस इंसान को जोड़ने की क्षमता रखता है , जिसे समाज ने दरकिनार करने की कोशिश की है। न जाने कब हिंदी हिन्दुओं की, और उर्दू मुसलमानों की भाषा समझी जाने लगी, कुछ पता ही नही चला। कमाल की बात यह है कि हिंदुस्तान की प्रमुख बोली न ही हिंदी है और न उर्दू, उत्तर भारत की बात की जाए तो कई ऐसी जगह हैं जहां हिंदी-उर्दू का मीठा मिश्रण यानि हिंदुस्तानी बोली जाती है। बाक़ी कई राज्यों में उनकी राज्यभाषा, हिंदी और अंग्रेज़ी का प्रयोग होता है। भाषा के संरक्षण के लिए, हर वर्ष कुछ कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। उन्ही कार्यक्रमों में से एक है जशन-ए-रेख़्ता, जहां फ़िल्म और साहित्य जगत के मशहूर फ़नकारों के साथ-साथ उनके प्रेमी और प्रशंसक भी पहुँचते हैं।

इस वर्ष जशन-ए-रेख़्ता का उद्घाटन, प्रमुख आध्यात्मिक कथाकार, मोरारी बापू जी ने किया। उद्घाटन समारोह के बाद ही, वडाली भाइयों ने अपने मधुर संगीत से पूरे दर्शकों का दिल जीत लिया। ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम में आयोजित इस कार्यक्रम में, साहित्य प्रेमियों, आशिक़ों और कलाकारों के लिए बहुत कुछ देखने और आज़माने को है। यहाँ पर सआदत हसन मंटो और दुष्यंत कुमार से लेकर, हर उस लेखक और कवि की किताबें मिल जाएंगी जो हिंदी, उर्दू या हिंदुस्तानी में लेखन करता हो।

साहित्य प्रेमियों और आध्यात्मिक लोगों के अलावा यहाँ पर खाने-पीने के शौक़ीन लोगों के लिए भी बहुत कुछ है। अफ़सोस सिर्फ इस बात का है कि किताबों से ज़्यादा भीड़, आपको खाने की क़तारों में दिखती है। दिल्ली की इस कड़कती ठण्ड में शरीर को गरम करने के लिए, कबाब, कॉफ़ी और चाय का सहारा सबसे बेहतर है। अगर आप शाकाहारी हैं, तो कबाब की जगह आलू और पापड़ी की चाट भी एक अच्छा विकल्प है। इस माहौल को देख कोई भी व्यक्ति ख़ुश हो जाता है। इस बार के विख्यात कार्यक्रमों में रामायण, सोज़ख़्वानी,दास्तानगोई व अन्य कार्यक्रम शामिल हैं।

इन सभी कार्यक्रमों को दरकिनार करते हुए यदि आपको ख़ुद के साथ भी थोड़ा समय बिताना हो तो यह जगह बुरा विकल्प नहीं है। हर प्रकार की किताबें जिन्हे शायद कभी किसी ने अनैतिक और अश्लील घोषित कर दिया था, यहां ढूंढने पर मिल सकती हैं। जिस तरह खाना हमारे शरीर के लिए महत्वपूर्ण है, उसी प्रकार साहित्य और समाज को समझना भी एक विद्वान के लिए आवश्यक है। भाषा भले ही कोई सी भी हो ,मगर साहित्य का काम दिलों को जोड़ना ही होता है। समाज को समझना और हर भाषा का सम्मान करना हम सभी के लिए आवश्यक है।

Syed Zuhair Ali
Syed Zuhair Ali
A student of Journalism and Mass Communication who loves to write about social issues through his poetries.
http://thehindparidhan.com
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