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आख़िर क्यों है अनवर एक सामाजिक व्यंग्य ?

हर दशक में कुछ ऐसे चलचित्र आते हैं जो भले ही बॉक्स ऑफ़िस पर धमाल न मचा पाएं मगर अपने नज़रिये और संगीत से लोगों के दिल जीत लेते हैं। 2007 में मनीष झा के निर्देशन में दिखाई गयी अनवर भी उसकी एक बेहतरीन मिसाल है। फ़िल्म की कहानी में 4 किरदार हैं जिसमे मुख्य भूमिका सिद्धार्थ कोइराला और नौहीद साईरसी ने निभाई है। इसके अलावा फ़िल्म में मनीषा कोइराला,विजय राज़, राजपाल यादव, यशपाल शर्मा और हितेन तेजवानी ने भी अपनी भूमिका बख़ूबी निभाई है।

फ़िल्म में अनवर की भूमिका में सिद्धार्थ कोइराला और मेहरु की भूमिका में नौहीद साईरसी नज़र आये हैं। इसके अलावा मनीषा कोइराला ने एक पत्रकार की, विजय राज़ ने एक भिखारी की और यशपाल शर्मा ने एक पुलिस ऑफ़िसर की भूमिका बख़ूबी निभाई है। फ़िल्म में राजपाल यादव भी गोपीनाथ नामक एक पत्रकार के रूप में नज़र आये हैं, जिसकी फ़िल्म में शायद कोई ज़रूरत नही थी।

फ़िल्म की शुरुआत एक बस से होती है जिसमे उदास बैठा अनवर कुछ सोचता हुआ जा रहा होता है, और अचानक बीच रास्ते में एक जगह बस रुकवाकर उतर जाता है। जिसके थोड़ी ही देर बाद बारिश होने लगती है। बरसात भरी उस रात में, अनवर एक मंदिर में शरण ले लेता है। आपको बता दें कि अनवर हिंदी ( आनर्स ) का छात्र होता है और मंदिरो में अन्वेषण करना उसकी रूचि होती है। फ़िल्म में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले का समय दिखाया गया है, जिसकी वजह से पूरे विश्व में एक समुदाय विशेष के विरुद्ध नफ़रत का ज़हर फैल गया था। इसके अलावा इस चीज़ की झलक भी दिखलाई है कि किस प्रकार राजनेता अपने छद्म राष्ट्रवाद के एवज़ लोगों को भड़काते हैं, और वोट-बैंक की राजनीति करते हैं। विशेष धर्म से नाता रखने के कारण, अनवर को लोग आतंकवादी घोषित कर देते हैं।

फ़िल्म में हर व्यक्ति को एक तरफ़े और शर्त-रहित प्रेम में फंसा दिखाया गया है, अनवर भी उन्ही में से एक होता है। अनवर जिससे प्रेम करता है यानि मेहरु , उदित यानि हितेन तेजवानी से प्रेम करने लगती हैं। अलग-अलग धर्मों से सम्बन्ध रखने के कारण मेहरु और उदित घर से भाग जाते हैं। हालांकि उदित और अनवर अच्छे मित्र होते हैं मगर मेहरु से प्रेम के कारण उन दोनों की दोस्ती भी ख़तम हो जाती है। अपना बदला लेने के लिए , क्रोधित अनवर उनका पता मेहरु के रिश्तेदारों को बता देता है जिसके बाद वह उदित को मार देते हैं और मेहरु आत्महत्या कर लेती है। इस बात का दोष अनवर अपने ऊपर लिए घर से निकल जाता है।

फ़िल्म के निर्देशन में कई दृश्य दिल को लुभाने वाले थे मगर कुछ हिस्से का फ़िल्म से कोई लेना देना नहीं था। रूप कुमार राठौड़ की आवाज़ में गया हुआ संगीत ” मौला मेरे ” फ़िल्म की आत्मा माना गया है, वहीं कई सारी कहानियों का एक दूसरे के समानांतर चलना दर्शकों को भ्रमित कर सकता है। सभी कलाकारों ने अच्छा प्रदर्शन किया मगर विजय राज़ और यशपाल शर्मा ने अपने गिने चुने दृश्यों के बावजूद फ़िल्म में जान भर दी। अच्छी संकल्पना पर आधारित होने के बाद भी कई दृश्य काफ़ी धुंदले लगे मगर बतौर सामाजिक फ़िल्म, निर्देशक ने सभी स्थितियों को दिखाने की बेहतरीन कोशिश की है।

अगर फ़िल्म के तात्पर्य के बात करें, तो हर व्यक्ति के अनुसार वह अलग निकल सकता है। फ़िल्म का मूल उपदेश यह है कि धर्म हर किसी के पास है मगर धर्म को समझना बहुत मुश्किल कार्य है। साथ ही हर सदी में राजनीति हमेशा धर्म के आधार पर लोगों को बाँटती है और छद्म राष्ट्रवाद को बढ़ावा देती हैं । रही बात प्रेम की तो वह किसी से भी हो सकता है मगर सच्चा प्रेम वही है जिसमें न कोई शर्तें होती हैं और न कोई ख़ौफ़, बस आपका दिल और वो इंसान होता है।

Syed Zuhair Ali
Syed Zuhair Ali
A student of Journalism and Mass Communication who loves to write about social issues through his poetries.
http://thehindparidhan.com

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